लेखनी को पहली फटकार।😒

जब भावों के पुष्प लिए,
मैं पहुँची उनके पास।
छप जाएगी कविता मेरी,
मन में थी यह आस।
पर जिस कविता में लग
सिर्फ मेरी अकल
उनको लगी वो किसी
कवि की नकल।
हिंदी की थी वो एक ज्ञाता
उन्हें भला था कब यह भाता।
बोलीं, ये नकल वकल नहीं चलेगी
विज्ञान की छात्रा भी क्या कवि बनेगी।✍️

भूमिपुत्र के अश्रु।🌾🌾🌾😪🌾🌾🙏

नेता कितना हठी हठी सा
हठ इसका कब जाएगा…
इन सर्द ठण्डी सड़कों में
क्या किसान मर जाएगा..
है कितनी रातें ये सर्द ,
जब बादल गरजा करते हैं।
निष्ठुर पापी दुश्मन से वो ,
जम के बरसा करते हैं।
सड़कों पे देखो नदियां सी,
कितनीं हैं बह जातीं।
हाय लहर उन नदियों की,
उसकी चादर तक आतीं ।
तब नेता ब्लोअर में
मदमस्त नींद सोता है।
भक्तों का विश्वास लिए वो
मन की बात कहता है।
इक किसान के अश्रुओं ने
ऐसी क्रांति मचाई…
हर इक बूंद अश्रु की उसकी
बन नदी, गाँव तक आई ।
हर कोई उस जल से सिंचित
उस ओर चला आया था।
जिस ओर, उस भूमि पुत्र को,
नेता ने बहुत रुलाया था।
दिखा किसानी-धर्म वहां बस
और न कोई धर्म दिखे।
संविधान की शक्ति दिखे
और अश्रु की भक्ति दिखे।
जर जोरू जमीन का झगड़ा
नेता अब न दिखाओ तुम।
जिनसे महाभारत युद्ध छिड़ा
जिद्द वैसी अपनातुम
‘जयश्री राम’ चिल्ला चिल्ला कर
भारत को मत तोलो ।
सब धर्मों का करो मान फिर
भूमि-पुत्र संग ,बैठ के तुम भी सत वाहे गुरु,असलम अलैकुम,
‘जय सिया राम जी’ बोलो । ️✍️

वो तीन घण्टे ।🙄☺️

वे तीन घण्टे पल की तरह छोटे थे। कितने बंधे बंधे से थे । हाथ की नोट books बाहर रख examination room में enter करना लगता सब कुछ भूल चले थे।
Answer sheet मिलते ही Roll numberआदि लिखना। Question paper देखने से पहले मन ही मन ईश्वर का स्मरण करना।
पेपर मिलते ही पूरे प्रश्न-पत्र को देखना कि कितने प्रश्नों के उत्तर आते हैं। 10 मिनिट तो इन्ही कामो में लग जाते।
प्रश्नों का उत्तर लिखते हुए बीच में ही invigilator का first page check करना बुरा लगता ।
दूसरे प्रश्न का उत्तर पूरा भी न हो पाता कि घण्टे की टन्न की ध्वनि सतर्क करती कि एक घण्टा हो चुका।
दूसरा घण्टे में दूसरा तीसरा पूरा होते होते चौथे प्रश्न को पढ़ रहे होते थे और
चौथा प्रश्न शुरू ही किया होता कि घण्टे की टन्न आवाज फिर सतर्क करती कि बस अब एक बचा है ।
पांचवां प्रश्न का उत्तर शुरू ही किया होता तो अचानक वो घण्टा बचता जिसमें invigilator कहती केवल 15 मिनिट बचे हैं इसके साथ ही एक सफेद सुतली(thread) सबके table में रख कर कहतीं कॉपी बांध लो, bind your answer sheets.
उनके आगे ही बढ़ते हम फिर लिखना शुरू कर देते थे।
कुछ तो तब तक खड़ी रहतीं जब तक कॉपी बांध न लें।
कैसा भयानक होता था वो पल जब अगले अंतिम घण्टे की आवाज बजते ही invigilator कॉपी छीन कर ले जातीं।
बाहर आते ही हम question paper में solved questions पर टिक करते । कई पेपर तो बहुत अच्छे जाते पर कुछ में प्रश्न छूट भी जाते थे।
अब लगता है वे तीन घण्टे जीवन का सार थे । ✍️

छूटी तब आशा ।😪

सेवा भाव संग
कर्त्तव्य लिए,
रहता संग भय भी,
करता था, अतृप्त
अब छोड़ चला
हो गया हूँ तृप्त।
‘आशा’ की चिंता
सेवा में,
मैं मग्न रहा
होकर निर्विघ्न।
आशा ही तो
जीवन थी मेरा
पर आज मुझे तो
जाना है।
अब मृत्यु-शांति
संगिनी है मेरी
उसका भी साथ
निभाना है। ✍️

कुछ कुछ समझ न पाई।🤔🤗

इक बच्चे ने आकर
मुझको बातें हैं समझाईं।
मासूम है जीवन अपना
मगन रहो मेरे भाई।

कुछ तो समझ गई मैं पर,
कुछ कुछ समझ ना पाई।

एक तरुण ने आकर
मुझको बातें हैं समझाईं।
जितनी कर सकते हो मेहनत
कर लो मेरे भाई।
जीवन तो है इक जुगाड़,
तुम जोड़ लो जितना भाई।

कुछ तो समझ गई मैं पर,
कुछ कुछ समझ ना पाई।

इक वयस्क ने आकर
मुझको बातें हैं समझाईं।
जितनी चिंता कर सकते हो,
कर लो तुम मेरे भाई।
घड़ी जो निकली जाती है,
फिर लौट कभी न आई।

कुछ तो समझ गई मैं पर,
कुछ कुछ समझ ना पाई।

एक बुजुर्ग ने आकर
मुझको बातें हैं समझाईं।
दो पल के जीवन में अपने
थी समुंद्र गहराई ।
इक दिन आने का था बस,
इक दिन जाने का भाई।

थोड़ा थोड़ा समझी हूँ ,
जब पल में भूलूँ भाई । 🤔 ✍️


* * * * * * * * * * * * *

सिंघु बॉर्डर।🎉🇮🇳🙏🌱🌾⛏️🚜

मन हुआ नमन
उस राह में जाकर,
जहां बैठा था किसान,
जमीं लुटने से घबराकर।
अपने भारत के दर्शन,
हो जाते यहां पर आकर।
जैसे ईश्वर के दर्शन,
हो जाते मन्दिर जाकर ।
खुदा स्वयं मस्ज़िद से आए।
हर वाणी में गुरुद्वारा।
कितनी ताकत से बैठा है,
मेरा देश ये प्यारा।
कुछ उद्घघोष यहां से आते,
थे नारा एक लगाते।
जय जवान और
जय किसान सुन,
नेता थे डर जाते।
हर नेता व्यापारी था अब,
इनके गुरु गुजराती।
नंबर वन के व्यपारी सब,
नाचें ज्यूँ बाराती।
झूम रहे जो कुर्सी पाकर,
उनसे देखा ना जाता,
जब अन्न उपजाने वाला
खुलकर पीज़ा खाता।
नेता के कल्चर का पीज़ा
भी है ,खेत की माया ।
इनकी ही तो मेहनत से
खेत हरा लहराया।
सब धर्मों के बीच में
देखो कैसे खोदे खाई।
ये ना जाने संविधान का
नाता पक्का भाई।
आशीर्वाद सभी का
है किसान के मत्थे।
वाह गुरु दा खालसा
वाह गुरु दी फतेह। ✍️

In

अंतिम साँसे।😴

देखो दुनिया से जा रहा है वो।
खाली खाली साआया था ।
खाली खाली ही जा रहा है वो।
जिन साँसों ने साथ दिया
उन्हें ही छोड़े जा रहा है वो।
सांसे जो गिनती की शर्तों में
साथ देने आईं थीं,
उनकी ही विदाई किये
जा रहा है वो…
ओह… ✍️

प्रेम भाव ।💕🔔

भाव तुम्हारे पाकर पहुंची
इस दुनिया के पार।
जहां तुम्हारी गरिमा थी
और आनंद था अपार।
ये छोटे छोटे से सुख,
सच में क्या कर जाते
दुनिया के सारे दुख मानो
छू मंतर ही जाते ।
इन भावों में सच मानो तुम
ईश्वर का सुख पाती हूँ।
मन्दिर के घण्टों की गूंज में,
नतमस्तक हो जाती हूँ।✍️

आज रजाईं है मुस्काई।☺️

आज रजाईं है मुस्काई।
बहुत दिनो से बंद बॉक्स में,
मैं थी और मेरी तन्हाई ।
रेशमी कम्बल सबको भाए,
वो ही पहले बाहर आए ।
एक अकेली सिमटी सी मैं,
बॉक्स में ले मन को मुरझाए ।

चर्चा हुई थी कल इस घर में,
कैसे ठंड में भीगा वो भाई।
झुग्गी में रहता जो बोला,
सुन सभी का मन था डोला।
मुझे बॉक्स से बाहर निकाला
और जाकर उसको दे डाला।
लगा आज अपने घर आई।
संग मेरा पाकर वो है खुश,
उसके संग मैं भी मुस्काई।✍️

आंदोलन।⛏️🚜

○न जाने कुछ वर्षों से है,

कौन सा ग्रह यह आया ।
हिन्दू मुस्लिम करके उसने,
जनता को भरमाया।
कुछ अपनी ही कंपनियों का, पड़ा है उस पर साया।
देश को ना बिकने दूंगा,
था नारा एक लगाता ,
पर एक एक करके था ,
सब कुछ बिकता जाता।
अबकी बार गले की फाँस
बन गए अन्न दाता ।⛏️
जिनको अब तो ना उगला
और ना ही निगला जाता ।
जय जवान और जय किसान का जोश था फिर सेआया ।
वो ग्रह अबकी बार दिखा है
थोड़ा सा घबराया ।
कुछ वर्षों से पिला रहा है,
हिन्दू मुस्लिम हाला ।
जलियां वाले बाग़ के लोगों से
अब पड़ा है पाला।
हर पंजाबी भगत सिंह , पंजाबन शेरा-वाली,
पूरी जनता भी संग में है
हरियाणी-बंगाली।
पंजाब ने समझाई है,
संविधान की सतह।
वाह वाह गुरु दा खालसा
वाह वाह गुरु दी फतेह।✍️

वो क्यों हारी । 😢

जो बेटी घर की चहल-पहल ।
थी कोमल जैसे एक कमल।

निर्मल मन घर से जो निकल,

थी रही टहल ।
छलके वो नयन, पल पल छल छल ।
गरल भरा वह कोलाहल ।
किसने जीवन में दिया दखल ?
वह दुर्बल मन हो गई विह्वल ।
जैसे ‘बूंद गिरे धरती के पटल’ ।

मरने के बाद वो क्यों मारी ?
बिन कारण ही वह क्यों हारी ?
ध्वनि विपक्ष की हुई प्रबल।
नेता बलशाली था घर से निकल ,
चिल्लाया फिर से उछल उछल,
आओ संग में मेरे गाओ-
“बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ।”✍️

आज बहुत रोया ये थैला।

आज बहुत रोया यह थैला ।
लटके लटके हो गया मैला ।
कबसे कार में नहीं हूँ बैठा
जबसे बॉस तुम्हारा ऐंठा।
ले जाते थे मुझे बाज़ार।
भरते मुझमें चीज हज़ार।
कभी न मैंने ना ना की
सारी ताकत से भर लीं।
सोचा पहला भोग तुम्हारा
मुझको ही मिल जाता था।
पल भर की बस इसी ख़ुशी में
कितना मैं खिल जाता था।
सोचो कितने महिनों से,
छुपा हूँ दरवाजे पीछे।
तुमने भी जब देखा मुझको
नजरें कर लीं अपनी नीचे।
देखो इन नीची नज़रों को
अब मैं भी देख न पाऊंगा
हुए निराश अगर तुम इतना,
मैं रोने लग जाऊंगा।✍️

बाती दीपक की।

कैसा है ये मेल,
समेटे अपने अंदर तेल।

जलाने पतली सी बाती को।शिक्षा देती उस स्वाति को ।

लक्ष्मण-रेखा में सिमटी सी,
जीवन ज्योति जलाती जाती।

धीमे धीमे मिटती जाती ।
अंधकार से लड़ती जाती ।

चर्च में कैंडल रूप बनाए।
प्रेयर में जैसे जुट जाए।

मन्दिर में ये रखी जाती ।
और मज़ारों में दिख जाती।

तेल जलाता जिस बाती को,
उस बिन पलभर रह नहीं पाती।

जब उसके बिन बुझ जाती है ,
कहते हैं सब ,
‘बुझा है दीपक’ ।…✍️

रंग बिरंगा बाग बगीचा।🇮🇳

रंग बिरंगा बाग बगीचा सबको था भाया।
कलियां थीं और खिले फूल थे,
भंवरा भी मंडराया।
वर्षों से थे माली इस सुंदर फुलवारी में।
स्वर्ग जमीं पर ले आने की
थे तैयारी में ।
देख खिले फूलों को ,
दूजा भी खिल जाता था।
एक अगर मुरझाया तो,
दूजा मुरझाता था।
फूलों का सौंदर्य देख
लोग वहां आते थे।
रंग बिरंगी तितली चिड़िया
आनंद दे जाते थे।
पर इक दिन बदले माली,
छटनी की थी ठानी।
इसको काटा उसको छांटा,
थे करते मनमानी।
धीरे धीरे मौसम बदला,
फूल लगे मुरझाने।
माली नए थे नए तरीके
से लगे सुलझाने।
उस जमीं को बेच धनी को
माली मुस्काए।
जेब भरीं थीं दोनो की
रहते थे इतराए।
यादों में वो बाग हमारे
अब भी आता है।
अलग अलग फूलों की
रंगत याद दिलाता है।
संभलो जब तक,
साथ खिलें हम,
आनंद तब तक आएगा।
वरना एक और बाग़ भी,
धीरे से बिक जाएगा।✍️

ना सीता ना..ना।😪

मत बनाओ सीता बेटी को
अग्नि परीक्षा कब तक देगी ?
कब तक दुख भुगतेगी ?
राम तो राज्य करेंगे फिर से,
वो धरती रुख करेगी ?
ना ना ना ना….
उसको भी पतलून पहन कर
सैनिक एक बनाओ ।
चारों ओर घिरे जो रावण
मनमानी करते हैं।
उनको अग्नि देनी हो गर तो
ज्वाला इसे थमाओ।✍️

दुलहिन सा वृक्ष।💖🎺

एक पेड़ क्रेन से आया ।

जड़ में बहुत सी मिट्टी लाया ।

क्रेन की धुन सुन माली आया।

पेड़ देख वो था मुस्काया।

अपने बाग़ में जगह बना कर,

उसे सहेजा और लगाया ।

उसकी महक सभी को भाए।

जैसे इक सुंदर सी दुलहिन घर में आए

और घर के मंदिर में ,

पहला दिया जलाए। 💞📯….✍️

नन्दू सच बोला।👍🤗

नन्दू नन्दू
हाँ दादी ।
खाया लड्डू ?
हाँ दादी ।
सच तो बोला ?
हाँ दादी।
इतना भोला ?
हाँ दादी।
आजा राजा ।
हाँ दादी ।
गोदी आजा।
हाँ दादी।✍️

Design a site like this with WordPress.com
Get started