याचना। 🙏

कितना अच्छा होता भगवन, तुम थोड़ी शक्ति देते ।

दूजा दिन आते ही हम भी, पहला दिन डिलीट करते ।

वर्षों तक न जाने क्यों,कुछ बातें पीछा करतीं हैं ।

जितना भी आगे बढ़ जाएं, छाया बन कर चलती हैं ।

कुछ अपने संग चलते चलते ,जीवन के थे छन्द हुए ।

मानो उन छन्दों के पन्ने तेज हवा से बन्द हुए।

बस यूँ ही कुछ ऐसे लम्हें, हम भी तो भूला करते।

दूजा दिन आते ही हम भी,पहला दिन डिलीट करते।✍️

जश्न ए ज़िंदगी ।📯🎷💝

तेरा- मेरा मेरा-तेरा,
इसी जन्म का प्रश्न है।
फिर तो देखो जब जाएंगे ,
मनता फिर भी जश्न है ।
दुनिया में आने के छै दिन
बाद हमारी छटी मनी।
जाने के बस तीन ही दिन में,
होने लगी उठावनी।
तेरा-मेरा मेरा-तेरा ,
इसी जन्म का प्रश्न है….।
आने के महीनों तक देखो,
खुशी मनाई जाएगी ।
पर जाने में कुछ दिन तक ही ,
एक दिया जल जाएगा।
तेरा-मेरा मेरा-तेरा,
इसी जन्म का प्रश्न है … ।
अन्नप्रासन का जश्न मने तब,
सब पूछे क्या खाएगा ,
और तेरहवी प्रश्न ये पूछे,
पंडित क्या बनवाएगा ।
तेरा-मेरा मेरा-तेरा,
इसी जन्म का प्रश्न है…..
बड़े हुए जब परिचय ‘ ये हैं ‘
कह कर जाना जाएगा ।
जाने पर’ ‘ये वो थे’ कह कर ,
हमको पहचाना जाएगा।
तेरा- मेरा मेरा- तेरा
इसी जन्म का प्रश्न है…..
जीते जी हर परिचय में,
हाथ मिलाया जाएगा ।
जाने पर हर परिचय में ,
तस्वीर पे रुख हो जाएगा ।
कोई कब्र में और कोई,
चिता-भस्म हो जाएगा।
तेरा-मेरा मेरा-तेरा,
इसी जन्म का प्रश्न है ।
इसीलिए जब तक जिंदा हैं ,
जश्ने- जिंदगी मनाए हम ।
धरम- भरम की बात छोड़ ,
इक प्रेम- रंग रंग जाएं हम । ✍️

एक थी मुनियाँ 👩👩‍👧‍👦

T.V.news में पैदल चलते मजदूरों को जितनी बार देखती हूँ , मुनियां की याद आ जाती है।
नया सरकारी आवास मिला था हमें । घर में प्रवेश करते ही घर के बगीचे में दीवार से सटे चांदनी के पेड़ पर नजर पड़ी तो एक डाल पर बैठी थी वो । ये ही 9-10 साल की रही होगी ।फ्रॉक पहने, घुंघराले बाल, सांवले रंग की हंसती हुई सी । हमने कहा था नीचे उतरो। कहां से आई हो ? अभी गिरोगी तो चोट लगेगी नीचे क्यारी की ईंटे हैं । क्या नाम है तुम्हारा ? एक ही बार मे नीचे कूद गई थी वो । बहुत भोलेपन से बोली मैं मुनियां हूँ। मेरी माँ यहां काम करती है । आप नए आए हो ? इस घर की पहले वाली आंटी बहुत अच्छी थीं। फिर वो मेरे दोनो बच्चों को देख कर मुस्कुराईं थी । एक अनौखा सा अपना पन था उस बच्चे में, शायद इस आवास में पहले रहने वाली आंटी के स्नेह के कारण ..। उसकी माँ हमारे घर काम करने लगी थी और मुनियां मेरे दोनो बच्चों को देखा करती । इस काम के लिए उसे ही रख लिया था हमने ।
देखते ही देखते मुनियाँ बड़ी होने लगी थी। माँ 15 वें साल में उसे गांव ले गई थी। जब लौटी तो बड़ी सी बिंदी , मांग में सिन्दूर और हाथों में चूड़ियां पहने थी । उसे देखते ही मैंने आश्चर्य से पूछा तो बोली माँ ने मेरी शादी कर दी है । लड़का गाड़ी चलाता है। बहुत पैसा मिलता है वहाँ । मैने पूछा उसको नही लाई ? वो बड़े भोलेपन से बोली जब गौना होगा तब आएगा। बम्बई में रहता है । कुछ महीने बाद मुनियां की माँ को अपने गांव के रिश्तेदार से पता चला कि लड़का ट्रक दुर्घटना में मारा गया था। उस दिन से मुनियाँ बहुत गंभीर सी हो गई थी । माथा बिंदी के बिना सूना सा हो गया था। उसकी भाभी ने जल्दी ही दूसरा लड़का ढूंढ लिया था। घर से कुछ ही दूरी पर रहने वाले बिहारी लड़के से ही उसका विवाह हो गया था। इस बार उसके लिए हमने भी खूब सामान खरीद कर दिया था। चार पहिये वाले ठेले पर रख खुला समान दहेज कह कर ले जाया गया था । अबकी बार बिना गौने के वो ससुराल पहुंचा दी गई थी।
विवाह के कुछ महीने बाद वो मिलने आई थी । चेहरे में पहला सा उत्साह नही था बोली, “आंटी बहुत पीता है और फिर मारता है ।” मुनियाँ की माँ शायद सब समझती थी इसीलिए मुनिया को वापस घर ले आई थी । वो बीमार सी हो गई थी ।शहर के डॉक्टर को दिखाया था उसने । कई बार उसकी झुग्गी झोपड़ी में उसे देखने जाती तब वो स्वयं ही उठ गिलास में मेरे लिए पानी ले आती । उस बच्चे के हाथ का पानी ना जाने क्यों बहुत मीठा लगता था ।
उस दिन मुनियाँ की माँ को गांव जाना था। बोली मुनियाँ को इलाज के लिए बिहार ले जाना है। वहाँ झड़वा देंगे ठीक हो जाएगी । बस 10 दिन की छुट्टी दे दीजिए ।
लगभग एक महीने बाद मुनियाँ की माँ अकेली लौटी थी अपने गाँव से । बोली मुनिया नहीं रही।
आज भी विश्वास नही होता कि मुनियाँ रही नहीं। लगता है मुनियाँ के गांव जाकर उसे ले आऊं । जब कभी उस से कहती थी मुनियाँ तेरा गाँव देखना है। वो हंस कर कहती , ” बिहार में है मेरा गाँव ,आप नहीं चल पाओगे आँटी गाड़ी से उतरने के बाद बहुत दूर तक पैदल चलना पड़ता है तब जो आता है मेरा गांव ।”
आज न जाने क्यों सड़कों में चलते मजदूरों के बीच मुनिया भी कहती सी दिखती है, देख लो आंटी इनके पैर कितने दुखते होंगे । गाँव शहर से कितना दूर होता है ना? मुनिया का अनकहा ,अनसुना ,आंतरिक दर्द इन मजदूरों को अपने गावों की ओर जाते देख, महसूस करती हूँ। लगता है मैं भी इनके साथ-साथ एक दूरी तय कर रही हूँ ।✍️

फिर से माँ की याद आ गई ।💝

बाथरूम में फिसली जब मैं ,
“ओ माँ” कह कर जो चिल्लाई।
आँखों से बह निकले आँसू ,
फिर से माँ की याद आ गई।
अलमारी खोलूं जो अपनी,
रंग बिरंगे कपड़े देखूं ।
तरह तरह के सूट मैं देखूं।
देखी जब हेंगर में साड़ी,
फिर से माँ की याद आ गई।
टीवी खोलूं जब अपना मैं,
मन ले डोलूं ये अपना मैं।
जो मन चाहे चैनल देखूं,
न्यूज़ मैं देखूं व्यूज भी देखूं ।
पर जब आया गीत पुराना,
फिर से माँ की याद आ गई।
सुबह सवेरे जब उठ जाऊं ,
पौधों में पानी दे आऊं।
तरह तरह के पौधे देखूं ,
हरी भरी बेलों को देखूं।
देखा जब तुलसी का पौधा,
फिर से माँ की याद आ गई।
सुबह सुबह कुछ व्यस्त रहूं में।
घर कामों में मस्त रहूं मैं ।
पूजा घर का मान मैं करके,
ईश्वर का फिर ध्यान मैं करके,
बैठी जब पूजा चौकी पर,
फिर से माँ की याद आ गई।
फिर से माँ की याद आ गई ।✍️

शनि शिंगणापुर 🙏

पिछले वर्ष महाराष्ट्र में कई मंदिरों के दर्शन पाने का आशीर्वाद मिला। ‘शनि शिंगणापुर’ जाकर एहसास हुआ कि व्यक्ति केवल इस देवता से डरता है शायद । सबसे हटकर था यह मंदिर । ना कोई प्रवेश शुल्क, ना कोई चढ़ावा ,न कोई पुलिस हजारों की भीड़ क्रम बद्ध पंक्ति, फिर भी अनुशाशन इतना कि सब की नजर केवल शनि महाराज पर थी । दर्शनीय था वो मंज़र वो सादगी वो ‘श्रद्धा’ वो अनुशासन। साक्षात न्याय के देवता की उपस्थिति का अहसास कभी ना भूल पाने वाला क्षण बन गया ।✍️

माँ भी कभी….

माँ भी कभी
लड़कियों सी रही
होगी।
बेटी छोटी सी
अपने माँ के
घर,
अल्हड़ रही होगी।
उछलती कूदती होगी।
पिता की ‘बेटा’ आवाज,
कान में गूंजती होगी।
फिर…..
“उस सुबह” से पहले,
रात में अग्नि के फेरे ,
उसे अनजान राहों पर,
कहीं
तेजी से ले जाते।
जैसे घर का इक पौधा,
कही जाकर लगा आते ।
वसीयत जिंदगी भर की ,
किसी के नाम लिख आते ।
उसे नए नाम दे जाते
कोई भाभी कोई चाची
कोई ताई भी कह जाते।
वो अग्नि के फेरे ,
जादू सा कर जाते ।
नया जन्म है तेरा
कानो में कह जाते ।…. ✍️

मैं खुद से खेलूं रे।💃👓🖼️

आँख मिचौली का खेल मैं खुद से खेलूं रे।
खुद से पूछूँ आ जाऊं ? फिर आजा बोलूं रे।
मन, मोबाइल, चश्मा मेरे बन गए साथी रे ।
इन अपने संगी साथी बिन, कैसे रहलूं रे ।
आंख मिचौली का खेल मैं खुद से खेलूं रे।
खुद से पूछूँ आ जाऊँ ? फिर आजा बोलूं रे ।
बोले चश्मा कहाँ छुपा मैं, ढूंढ ले मुझको रे ।
ढूँढू उसको इधर उधर फिर पा लिया बोलूं रे।
आंख मिचौली का खेल मैं खुद से खेलूं रे।
खुद से पूछुं आ जाऊं? फिर आजा बोलूं रे।
मोबाइल भी चुप छुप देखो , मुझे सताए रे।
कहां छुपा हूँ ढूंढो मुझको, धुन में गाए रे ।
आंख मिचौली का खेल मैं खुद से खेलूं रे ।
खुद से पूछुं आ जाऊँ ? फिर आजा बोलूं रे ।
इधर भी देखूं उधर भी देखूं, किधर है बोलूं रे।
तकिया – नीचे पा जाऊं फिर, पा गया बोलूं रे।
आँख मिचौली का खेल मैं खुद से खेलूँ रे ।
खुद से पूछुं आ जाऊं ? फिर आजा बोलूं रे। ✍️

पल भर के रिश्ते💞

वैसे तो कई बार नैनीताल की ओर गई हूँ परंतु अक्सर रामपुर रोड काशीपुर बाजपुर के तिराहे से रास्ता confuse करता है। कार में उस दिन G.P.S. काम नही कर रहा था और हम हल्द्वानी न जाकर काशीपुर पहुंच गए थे। तब से कार रोक कर पास खड़े लोगों से रास्ता पूछ लेते हैं । कार का window glass नीचे करके हम पास खड़े लोगों को बुलाने का इशारा जैसे ही करते दो तीन लोग तेजी से आते ,हम पूछते ” भैया हल्द्वानी का रास्ता कौन सा है ? वे बड़ी आत्मीयता से समझाते “आप इस रास्ते से जाइए रामपुर road का रास्ता उबड़ खाबड़ है । आपको परेशानी होगी ।” दूसरा कहता बाजपुर के रास्ते की सड़क अच्छी है लेकिन रात को सुनसान हो जाती है वो सड़क ।रात के लिए उतनी सुरक्षित नही है ।” हम उनको धन्यवाद कहते हुए window glass नीचे कर आगे बढ़ जाते हैं ।
सोचती हूँ ये अक्सर होता है कहीं भी नई जगह या दूर जाने पर हम अनजाने लोगों से राह पूछते हैं और उनके बताए रास्तों में कितने विश्वास के साथ चल पड़ते हैं उस दिशा में और अपने गंतव्य को पा लेते हैं।
महसूस किए है मैंने ये रिश्ते भले ही क्षणिक हों एक तरफा निस्वार्थ से ये लोग । बहुत दूर तक अपनी ध्वनि बनाए रखते हैं ये। ये लोग ना हिन्दू लगते हैं ना मुसलमान बस बहुत अपनत्व समेटे हुए से हैं , ये पल भर के रिश्ते कितनी राहत देते हैं। 🙏 ✍️

माँ ने ऐसा feed किया,कुछ दूध में अपने घोल कर।

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माँ ने ऐसा feed किया,

कुछ दूध में अपने घोल कर ।

सबकी चिंता रही उसे,

बस अपनी चिंता छोड़ कर

अक्सर बेटी त्याग- भाव में,

कितना कुछ कर जाए।

“नारी तुम केवल श्रद्धा हो”,

इस पथ को अपनाए ।

सिद्दार्थ छोड़ घर से जब निकले,

गौतम बुद्ध बन आते ।

और यशोधरा चिंतित हो कहती ,

सखी वो मुझ से कह कर जाते ।

पुत्र की भिक्षा दे गौतम को,

खड़ी थी हाथ वो जोड़कर ।

माँ ने ऐसा feed किया ,

कुछ दूध में अपने घोल कर…..

राम की अर्धांगिनी बन सीता,

वन – वन साथ निभाए

आदर्श पुरुष बन गए राम,

पर सीता धरा समाए ।

पुत्रों का संग पाकर पी गई,

जीवन के दुख घोल कर ।

माँ ने ऐसा feed किया,

कुछ दूध में अपने घोल कर …..

सत्यवान की चिंता में,

सावित्री ने शक्ति लगाई,

पति की उम्र बढ़ाने को ,

वो यम के पीछे आई।

थकी नहीं वो कन्या तब तक,

विजय ना पाई मौत पर,

माँ ने ऐसा feed किया ,

कुछ दूध में अपने घोल कर …..

मेवाड़ की पन्ना धाए को,

इतिहास भुला ना पाए।

रानी का वचन निभाने को,

सुत अर्पण कर आए।

अश्रु नयन में थाम खड़ी वो,

जैसे फूल हो शूल पर।

माँ ने ऐसा feed किया,

कुछ दूध में अपने घोल कर…..

झांसी की रानी भी रण में,

बिगुल बजा कर आई,

पर वो माँ थी, पुत्र की चिंता,

उसके दिल में छाई।

बांध पीठ पर पुत्र को अपने,

चली युद्ध घुड़दौड पर।

माँ ने ऐसा feed किया,

कुछ दूध में अपने घोल कर…..

इंदिरा ने भी देश की चिंता,

में थी जान गवाई,

माँ की इकलौती बेटी,

दुर्गा अवतार में आई,

दे गई खून का हर इक कतरा,

देश प्रेम में तोल कर ।

माँ ने ऐसा feed किया,

कुछ दूध में अपने घोल कर…..

सदी बीसवीं में बेटी ने ,

माँ की छवि थी पाई।

मदर टेरेसा नाम से महिला,

दुनिया भर थी छाई।

सेवा – भाव से भारत आई ,

सीमाएं सब तोड़ कर।

माँ ने ऐसा feed किया

कुछ दूध में अपने घोल कर…..

अपने देश की एक कल्पना ,

थी आकाश में छाई ।

विज्ञान के रथ में बैठ के वो,

ऊंची उड़ान पर आई।

अपनों के मिलने से पहले,

सो गई यादें छोड़कर।

माँ ने ऐसा feed किया,

कुछ दूध में अपने घोल कर,

सबकी चिंता रही उसे,

बस अपनी चिंता छोड़ कर।✍️

दादी के दोहे ,🤓

देखो मेरा मस्त कलंदर ,🎈
मूंछें लगा के बना सिकंदर।🎩
दौड़े सरपट बाहर अंदर,
जैसे राजा कोई धुरन्धर ।👑
मैं कहती हूँ आजा बन्दर,🐒
आजा कर लें, ‘सन्धि पुरंदर’ ।
तुझे खिलाऊँ मैं चुकन्दर,🍭
दोनो मिल फिर चलें जलंधर।
देखो मेरा मस्त कलंदर🎈
मूंछें लगा के बना सिकंदर।…✍️

भोगी राम।🙏

कभी कभी कोई व्यक्ति अपनी कर्तव्यनिष्ठा से इतना शक्तिशाली हो जाता है कि वर्षों तक संपर्क टूट जाने पर भी वो अपने व्यक्तित्व की याद दिलाता रहता है ।
ऐसा ही एक व्यक्तित्व “चौकीदार भोगीराम” का तब सामने आ खड़ा होता है जब वर्षों बीत जाने के बाद वो आज भी अपनी उपस्थिति का अहसास कराता है ।
भोगीराम जिनकी ऊँची आवाज को किसी माइक की ज़रूरत नहीं थी । सफेद मूंछों एवं भारी भरकम कद काठी वाले भोगीराम का रुतवा ऐसा था कि विद्यालय के माननीय सचिव और प्रिंसिपल सर के समकक्ष उसे भी रखा जा सकता था। अगर आज भोगीराम के चेहरे का परिचय देना चाहूँ तो यही कहूँगी कि जब भी श्री मोहन भागवतजी को देखती हूँ तो भोगीराम की याद आ जाती है।
उनदिनों विद्यालय के चौकीदारों की कोई निश्चित यूनिफार्म नहीं थी पर भोगीरामजी अपने हल्के भूरे या सिलेटी सफारी सूट पोशाक में ही दिखाई देते । अपने साथ कुछ पक्षी पिंजड़े में लाते थे । शायद बटेर थे वो पक्षी ,जिन्हें विद्यालय के खेल मैदान के किनारे लगे पेड़ों की किसी एक शाखा पर टांग देते थे वो । इंटरवल में वो बटेर छोटे बच्चों का एक मनोरंजन होते थे।
कुछ बच्चों की आदत थी कि वे विद्यालय इंटरवल समाप्त होने के बाद ही पानी पीने नल के पास लाइन लगा लेते थे लेकिन भोगीरामजी के आते ही वे छूमंतर ही जाते ।
ग्यारहवी बारहवीं क्लास के जो छात्र विद्यालय समय में घर या कोचिंग जाने की जुगाड़ में रहते उनके लिए भोगीराम एक बड़ी बाधा थी जिसको पार करना आर्कमडीज के उस वैज्ञानिक प्रयोग की सफलता के समान था जिसमें वो अपना प्रयोग सफल होते ही ‘ यूरेका ‘यूरेका’ चिल्लाया था।
मुझे याद है अपने रिटायरमेंट वाले दिन वो गले में फूलों की माला पहने छात्रों के सिर पर प्यार से हाथ रख रहे थे ।पहली बार भोगीराम जी को बच्चों से इतना घुलते मिलते देखा था ।
भोगीरामजी के सेवानिवर्ती के बाद ही विद्यालय की बाहरी दीवारें बहुत ऊंची कर दीं गईं थीं । सेकुरिटी भी बड़ा दी गई थी । विद्यालय के आंतरिक प्रवेशद्वार पर कोई दूसरा चौकीदारआ गया था फिर भी भोगीराम के जाने से एक सूनापन था । पेड़ की वो शाखा भी मौन थी जिसमें भोगीरामजी का पक्षी वाला पिंजड़ा लटका करता था । आज भी जब ‘ चौकीदार, शब्द सुनाई देता है तो अपने विद्यालय के गरिमामयी कर्तव्यनिष्ठ चौकीदार भोगीराम जी को प्रवेशद्वार में खड़ा पाती हूँ । 🙏 ✍️

पाठ अधूरा।

कितना भी परफेक्ट हो टीचर,
कुछ ही मिनट पढ़ाता है।
पीरियड ओवर होते ही,
फिर वापस वो हो जाता है ।
       ऐ मेरी ज़िंदगी बता तू ,
       कब तक मुझे पढ़ाएगी ?
       मेरे ही अनुभव से मुझको
       कब तक तू सिखलाएगी ।
माँ ने अंगुली थाम बरस में,
चलना मुझको सिख लाया,
और पिता भी कुछ महीनों में,
बोल मेरे होंठों तक लाया।
        पर कब तक तू, द्रोणाचार्य सी,
        एकलव्य को भरमाएगी?
        मांग तेरी पल पल में मेरे,
        अंगूठे तक हो जाएगी ।
अब तक तू जीवन का मेरे,
सार नहीं समझा पाई।
बस सुख दुख के इन जालों में,
तू मुझको उलझा ले आई ।
        अब तो स्याही खत्म कलम की,
        अब और न मैं लिख पाऊँगी।
         इस जीवन का पार कहां तक ,
         बिन जाने ही जाऊंगी ।
✍️

कोई दूर से आवाज दे ।😪

वो अक्सर महीने में दो बार आता saturday या sunday . एक साफ रंग वाला मोहिला सा युवक था वो कभाड़ी वाला । बिना ट्यूब टायर की उसकी साईकल की आवाज ही उसकी call bell थी ।
पैंट को अपनी पतली कमर में साधने के लिए नाड़े का उपयोग करता । belt नहीं रही होगी उसके पास । पहचान इतनी हो गई थी उस से कि वो बाहर का main gate खोल कर अंदर घर के कैंपस में स्वयं ही आ जाता ।
उस दिन उसके बारे में और भी जानकारी मिली थी जब घर के बरांडे में news papers तोलते तोलते वो जोर से चिल्लाया था “कभाड़ी वाला”। मैं हतप्रभ सी थी । घर में तोलते तोलते इतनी जोर से क्यों चिल्लाया था वो। हंसी भी आई थी उस पर । मैंने पूछा बहुत तल्लीन रहते हो अपने काम पर। शादी हो गई तुम्हारी ? वो हल्की सी आवाज में बोला ,’मैडम तीन बच्चे हैं मेरे । तीनों बेटियां हैं। उन्हीं के लिए ये काम करता हूँ। पहले सिमको फैक्ट्री में था। वो फैक्ट्री बन्द हो गई, फिर मूंगफली बेची ।उसमें कुछ नही मिलता था ।इसलिए ये काम शुरू किया था।’ मैंने कहा बहुत लगन है तुम में । एक दिन खूब पैसे वाले हो जाओगे। वो बोला ,’ अभी 28 साल की उम्र है मेरी ।आपकी दुआ रहे तो तीनों बेटियों को खूब पढ़ाऊंगा ।’
जुलाई का महीना था वो । घर में news papers बहुत इक्कट्ठा हो गए थे। उसने कहा था ,”किसी और को मत दिया करिए । मेरा तराजू चेक कर लो, मैं कभी भी गलत दाम नही लगाऊंगा।” उसी के नाम थे वो पेपर्स। सोचा था शायद गर्मी के कारण इतनी दूर ना निकला हो।
बड़ा suffocating दिन था वो । कॉलोनी कैंपस में आने वाले दूसरे कभाड़ी वाले ने बताया था, ‘वो संजू ? वो तो रहा नहीं। डेड़ दो महीने हो गया उसे गुजरे। उसे तो कुत्ते ने काट लिया था। पैसे की कमी से पूरे इंजेक्शन नहीं लगा पाया था वो । उसकी घरवाली अपने बच्चों के साथ गाँव चली गई थी ।’
न जाने क्यों वर्ष बीत गए उसकी मजबूरियों से भरी आवाज ‘कभाड़ी वाला’ आज भी कभी कभी दूर से सुनाई दे जाती है । 😪✍️

पंडित जी के जूते।

घर में दीदी का विवाह था। बड़ा उत्साह था विवाह में हम बच्चे उस समय बहुत उत्साहित थे । रात भर कन्यादान पूजा पाठ चलता रहा। कन्यादान के बाद सुबह कब हुई, पता ही नहीं चला । रात को सभी बहन भाइयों ने गुप्त meeting की थी। जीजाजी के जूते छुपाने की । कुछ बुद्धिमान भाई बहनों की duty लगा दी गई थी, इस काम में । अच्छी रकम मिलने की आशा थी क्यों कि हमारे नए जीजाजी आर्मी में captain थे । जूते ऐसी जगह छुपाए गए थे कि लाख कोशिशों के बाद भी कोई बाराती ढूंढ न पाता । घर के outer gate की hedges के बीच । हमने जूते छुपाई से मिलने की रकम बड़ी सुनियोजित तरीके से तय की थी ताकि सभी विवाह में उपस्थित 8-10 बहन भाइयों का हिस्सा बराबर हो सके। सवेरे 9 बजे बारात की विदाई थी। सब ओर शांति सी थी । अचानक पंडितजी की तेज आवाज बार बार सुनाई दी, अरे मेरे जूते कहां गए अरे मेरे जूते। लोग जूते ढूंढने लगे ।लोग पूछने लगे पंडितजी से, कहाँ उतारे थे जूते ? थोड़ी ही देर में जीजाजी भी सामने आ गए । ये क्या हो गया था दूल्हे जीजाजी ने तो जूते पहने हुए थे ।हमसे बड़ी भूल हो गई थी जिस कमरे में जीजाजी, पंडित जी और कुछ लोगों ने प्रवेश किया था।वहां सबसे नए जूतों को दूल्हे का समझ लिया था।
हम पंडित जी से क्या demand करते ।उन्हें चुपचाप से उनके जूते लाकर दे दिए थे । ✍️

मेरे अपने

इस दुनिया मे कितने आए,
कितने आकर चले गए।

कितने दिल मे बसे रहे,
कितनो को हम भूल गए ।

कितने फूलों की खुशबू से,
अब भी महका करते हैं।

कितने आंगन के पंछी बन,
अब भी चहका करते हैं।

जितने जलसे हुए खुशी में ,
बन आशीष ‘वो’ संग रहे।

यह जीवन होली सी रंगत ,
‘वो’ रंग की रंगत बने रहे।

जितने दिल मे आप बसे हो,
‘वो’ भी दिल मे बसे रहे।✍️
🌹💐❤️🙏

आज याद आ गयी

वैज्ञानिकों तुम्हारी जय हो तुमने पृथ्वी को प्रकाशित किया अपनी मेहनत और लगन से।आज अंधेरा करके दिया जलाकर आप की याद आ गई । आशा है फिर से आप कोरोना की medicine खोज निकाल कर इस तम को दूर करेंगे। 🙏

गुरु शिष्य दोनों खड़े किसके लागूं पांव ।

उस दिन वो शिक्षिका बच्चे का हाथ पकड़ क्रोधित हो बोली मैडम इसे अपने रूम में बिठा लीजिए । ये बहुत misbehave करता है । क्लास में आते ही ये हंसता है । मुझे देखते ही बच्चा sorry बोला। कई बार उस शिक्षिका द्वारा उस बच्चे के लिए ढीठ शब्द का उपयोग किया जाने लगा था ।
उस दिन तो मैं भी अकेले में रोई थी वो शिक्षिका कुछ दिनों बाद उस बच्चे को फिर ले आई थी। वो बच्चा बहुत डरा हुआ था । आंखों में आंसू और सिसकियां लिए। इस बार शिक्षिका से क्लास रूम वापस जाने को कहा और बच्चे को अपने पास बिठाया था मैंने । पूछा था बच्चे से,आज क्या किया बेटा, वो बोला वो मैडम बहुत अच्छी लगती हैं जब प्यार से बोलती हैं।आज मैंने उनकी साड़ी छुई थी ,मम्मी से भी अच्छी लग रहीं थीं।
❤️ 🙏
जीशान नाम के उस बच्चे को नहीं भूल पाती जिसके नए एडमिशन ने क्लास में तहलका मचा दिया था । वो LKG में नया नया आया था । “शिक्षक” के ओहदे से अपरिचित वो बच्चा किसी की भी बात नही सुनता और अपनी मनमानी करता । अक्सर उसकी क्लास शिक्षिका उसे दूसरे सेक्शन में बिठा देतीं थीं । जो मेरे कक्ष के ठीक सामने था। एक दिन बहुत गुस्से में मुझसे आकर बोला था,” आप हरदम यहीं बैठे फ़ोन करते रहते हो बच्चों को क्यों नही पढ़ाते सारी मैडम पढ़ाती हैं आप इधर उधर घूम कर आ जाते हो । मैंने sorry बोला था उसे। उसने गुस्से में hold your ears कहा तब मैंने कान भी पकड़े थे अपने । वो रॉब से it’s O.K. कह कर अपनी कमर में हाथ रख क्लास में लौट गया था । अगले दिन उसकी क्लास में after attendance 1st period में “May I come in” ? पूछ कर गई थी बच्चों से ।। दोस्ती की थी उन बच्चों से । जीशान बोला था आप अपनी चेयर हमारे क्लास में रख लीजिए।
💕🌻🙏🏼
उज्ज्वल तब LKG में था। alphabet का dictation दिया गया था । ‘A’ , ‘C’, ‘E’,’G’ , ‘M’ सभी letters सही लिखे थे लेकिन जहां आई ‘I’ बोला गया था वहां eye draw कर दी थी उस बच्चे ने ।
👁️🌷🙏
बात पुरानी हो गई वो बच्चा आज multinational company में उच्च पद पर है। उस दिन घर में स्कूल से उसका test paper आया था । Alphabet लिखने थे उसे । उस बच्चे ने अपने पेपर में उल्टी सीधी जगह बिना क्रम के लिखा था। टीचर ने उसे marks न देकर बड़ा सा question mark रख दिया था । उस sincere बच्चे की लापरवाही पर आश्चर्य प्रकट किया था। उस से प्यार से पूछने पर ज्ञात हुआ कि उसने A to Z पूरा लिखा था लेकिन टीचर ने क्लास में सबसे बोला था ,” ये टेस्ट है सबको बिना देखे लिखना है। मैंने आंखें बंद करके लिखा था। बिल्कुल नहीं देखा था।”
🤔💝🙏🏼✍️

भय की दौड़।

भव्य राम मंदिर बन ने का पहला चरण सम्पन्न हुआ। काश इन्हीं दूर तक चलने वालों में Make in india ढूंढा जाता। इन्हीं में से कई मिल्खा सिंह और पी.टी. उषा मिल जाते। लेकिन ये तो भूख और भय की दौड़ है। जो मैराथन से कई गुना अधिक दूरी तय करवाएगी । इस दौड़ का प्रारम्भ किसी whistle के बजने या झंडे से नहीं वरन बेरोजगारी भुखमरी और मौत के भय के alarm से हुआ है ।
नेता अपनी मीडिया-मार्केटिंग से बहुत प्रसन्न हैं। जनता नेता की जय जयकार कर रही है। T. V.
सरकारी हो गए हैं और जनता भी सरकारी।
वो जो दिहाड़ी मजदूर सपरिवार खदेड़ा गया वो इस काबिल नही था कि उसका कोरोना का टेस्ट हो पाता। आज जब चंदा मांगा गया है तब बड़ी वाह वाही और तालियां बज रहीं हैं परंतु उस दिहाड़ी मजदूर को ना उस समय कुछ मिला जब 3000 करोड़ एक मूर्ति पर व्यय किया और ना आज । हां मिला तो किसी अभिनेता को 25 करोड़ देने की बधाइयां , ‘like’ और ढेर सारे retweet । वो दिहाड़ी मजदूर और उसका परिवार आज भी उस अग्नि-पथ में अपने घर की तलाश में दौड़ रहा है थका हारा सा ।✍️

डर लगता है उस बच्चे से।😪

समय के इस दौर में आदमी भूल गया उस रचयिता को जिसने बड़े शौक से इस दुनिया की रचना की होगी ।विशेषकर भारतवर्ष की रचना करते समय उसका मूड बहुत अच्छा रहा होगा। एक बच्चे के innocent brain सा । जो अपनी ड्राइंग में सूरज, पहाड़, बादल, वर्षा, पेड़ -पौधे ,हरियाली , नदी ,नाव ,खेत सब अपने छोटे छोटे हाथों से बना देता है । शायद उस समय अपनी इस रचना को बना कर श्रद्धा से उसने ये पुष्प हम पर ही चढ़ाए हों जिन्हें आज हम उन्ही पर चढ़ाते हैंऔर इसी श्रद्धा से उस रचियता ने हमे बुद्धि क्षमता कुछ अधिक दे दी हो ।
दुख है हमने हरदम उस ईश्वर को अपने कब्जे में कैद करना चाहा उन चार दीवारी बिल्डिंग में जिसे कभी मन्दिर कभी मस्ज़िद ,गुरुद्वारा, चर्च के नाम से हम उसके मालिक बन बैठे।अपना मालिकाना हक इतना समझ लिया कि हम भष्मासुर बन आदमी को दूसरे समूह में रख मानव का ही नाश करने लगे । मानव गुरु का झांसा दे स्वयं की पूजा करवाने लगा ।वो एक ब्रोकर बन ईश्वर और पुजारी के बीच दीवार बना और ईश्वर के स्थान पर स्वयं बैठ गया । मानव स्वयं का बनाया धार्मिक चोला पहन अपने को दूसरे से अधिक विशिष्ट समझने लगा। ईश्वर ने इसके canine teeth reduce किए थे और इसमें दया भाव डाला था लेकिन आदमी स्वयं ही एक हानिकारक वायरस की तरह behave करने लगा था। तब लगता है ईश्वर ने भी अपने इस drawing पेज को एडिट कर मानव को रोकने के लिए कोरोना की एंट्री कर दी है । कभी कभी डर लगता है यदि ये मानव ईश्वर की इस रचना का तिरस्कार यूं ही करता रहा तो वो रचयिता कही अपने इस रचना के पन्ने को फाड़ कर फेंक ना दे ,उस innocent बच्चे की तरह जो कभी झुंझला कर अपनी ही ड्राइंग पेज को मोड़ तोड़ कर फाड़ कर फेंक देता है ।✍️

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